तावड़े ने अपने प्रवास की शुरुआत नई पीढ़ी से संवाद के साथ की। सहजनवां के अटल आवासीय विद्यालय में विद्यार्थियों से मिले। जेन जी और जेन अल्फा की आकांक्षाएं समझने की कोशिश की। इसके बाद बातचीत का दायरा बढ़ता गया। तीन दिनों में वे संगठन के अनेक वर्तमान व पूर्व पदाधिकारियों से मिले। वर्तमान व पूर्व जनप्रतिनिधियों से मिले। समाज के अलग-अलग वर्गों के प्रमुख लोगों के साथ प्रबुद्ध वर्ग से भी मुलाकात का समय निकाला।
अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों की शुरुआत भाजपा ने गोरखपुर से की। प्रदेश प्रभारी बनाए जाने के बाद राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े का पहला गोरखपुर प्रवास महज संगठन की बैठक नहीं रहा। यह जमीन को पढ़ने की कवायद मणि जा रही है। तावड़े ने जातीय जाल में उलझे गोरखपुर क्षेत्र को शायद इसलिए चुना क्योंकि भाजपा के मजबूत प्रभाव वाले इस इलाके में पिछले चुनावों में तस्वीर बदली है। 13 लोकसभा सीटों वाले क्षेत्र में भाजपा ने 2014 में 12 सीटें जीती थी। 2019 में यह संख्या 10 हुई और 2024 में छह रह गई। विधानसभा में भी 2017 की 49 सीटों की तुलना में 2022 में भाजपा 35 सीटों पर सिमट गई। यानी 2027 की चुनौती सिर्फ सत्ता बचाने की नहीं है। पुराने गढ़ में बदले समीकरणों को समझने और उसके लिए रणनीति बनाकर पुरानी ताकत वापस हासिल करने की भी है।
राजनीतिक विश्लेषक डॉ. अमित उपाध्याय तावड़े की इस कार्यशैली को 2014 के चुनाव के समय केंद्रीय गृहमंत्री व तत्कालीन यूपी प्रभारी अमित शाह की यूपी में आजमाई गई रणनीति से जोड़कर देखते हैं। वह बताते हैं कि तब भी संगठन के साथ नाराज और घर बैठे कार्यकर्ताओं की बात सुनी गई थी। प्रबुद्ध वर्ग और स्थानीय प्रभाव वाले लोगों से फीडबैक लिया गया था। फर्क इतना है कि तब सत्ता से बाहर थे, सरकार में आने के लिए सारा दम लगाया गया था। इस बार सत्ता में हैं और तीसरी बार जीतने की रणनीति बनाई जा रही है। तावड़े के प्रवास का एक अहम पहलू मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की गैरमौजूदगी भी रही।तावड़े के सामने स्थानीय नेताओं और पूर्व पदाधिकारियों को खुलकर बोलने का अवसर मिला। उन्होंने यह संदेश भी दिया कि कोई अकेले में मिलना चाहे तो मिल सकता है।