पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी की यात्रा एक तरह से पूरे चक्र में लौटती दिखाई दे रही है। वर्ष 1998 में कांग्रेस नेतृत्व से लंबे समय से चले आ रहे मतभेदों के बाद ममता बनर्जी ने पार्टी से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था। उनका मानना था कि कांग्रेस पश्चिम बंगाल में दशकों से शासन कर रहे वाम मोर्चे को पर्याप्त चुनौती नहीं दे रही है।इसके बाद ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस को राज्य की प्रमुख राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित किया।
तृणमूल कांग्रेस में हुए विभाजन के बाद पार्टी के भीतर के ही कुछ नेता ममता बनर्जी के नेतृत्व और नियंत्रण को चुनौती दे रहे हैं। विवाद अब पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न तक पहुंच गया है।निर्वाचन आयोग ने विवाद के निपटारे तक तृणमूल कांग्रेस के मूल नाम और उसके प्रसिद्ध ‘जोड़ा घास फूल’ चुनाव चिह्न को अस्थायी रूप से फ्रीज कर दिया है। आयोग को यह तय करना है कि पार्टी के वास्तविक दावे का अधिकार किस गुट के पास है।
जिस कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने करीब 28 वर्ष पहले अपनी अलग पार्टी बनाई थी, आज उसी कांग्रेस के समर्थन की उन्हें जरूरत पड़ रही है। भाजपा के राजनीतिक अभियान के बीच ममता बनर्जी के लिए कांग्रेस का समर्थन महत्वपूर्ण हो गया है।इस तरह ममता बनर्जी की राजनीतिक यात्रा में एक उल्लेखनीय विरोधाभास सामने आया है। जिस विद्रोही तेवर के साथ उन्होंने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाई थी, आज उनकी अपनी पार्टी में उठे विद्रोह ने उनके नेतृत्व और संगठनात्मक नियंत्रण के सामने उनके लिए नई चुनौती खड़ी कर दी है।पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी और कांग्रेस के रिश्ते लंबे समय तक तल्ख रहे हैं। मुख्यमंत्री के रूप में अपने 15 साल के कार्यकाल के दौरान ममता ने राज्य में कांग्रेस के राजनीतिक अस्तित्व को खास तवज्जो नहीं दी।